Krishna Janmashtami Celebration Highlights
जन्माष्टमी 2025 का पर्व इस साल (अष्टमी तिथि प्रारंभ: 15 अगस्त, रात 9:44 बजे – अष्टमी तिथि समाप्त: 16 अगस्त, रात 11:19 बजे), शुक्रवार को बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। यह दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार, श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को समर्पित है। देशभर के मंदिरों में भजन-कीर्तन, रासलीला और मध्यरात्रि में विशेष पूजा का आयोजन होगा।
जन्माष्टमी का महत्व
जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आस्था, प्रेम और भक्ति का अद्वितीय संगम है। श्रीकृष्ण को प्रेम, करुणा और धर्म के प्रतीक के रूप में पूजा जाता है। उनके उपदेश, विशेषकर भगवद गीता, आज भी जीवन का मार्गदर्शन करते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि धर्म की रक्षा के लिए सदैव सजग रहना चाहिए और अन्याय के खिलाफ खड़ा होना चाहिए।
इतिहास और पौराणिक मान्यता
मान्यताओं के अनुसार, मथुरा के राजा कंस ने अपनी बहन देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में डाल दिया था, क्योंकि एक भविष्यवाणी में कहा गया था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका अंत करेगा। आठवें संतान के रूप में जन्मे श्रीकृष्ण को वसुदेव ने यमुना पार गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर सुरक्षित पहुंचाया। गोकुल में कृष्ण का बचपन रासलीला, बांसुरी की धुन और माखन चोरी की लीलाओं से भरा हुआ था।
राधा जी का जन्म ?
राधा जी का जन्म भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था, जिसे राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है. यह तिथि कृष्ण जन्माष्टमी के 15 दिन बाद आती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, राधा रानी का जन्म वृषभानु और कीर्तिदा के यहाँ हुआ था, लेकिन उनका जन्म उनकी माता के गर्भ से नहीं हुआ था. कुछ कथाओं के अनुसार, राधा जी एक कमल के फूल पर तैरती हुई मिली थीं, जिसे वृषभानु अपने घर ले आए थे. राधाष्टमी का उत्सव बरसाना और पूरे ब्रज क्षेत्र में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है.
एक मान्यता यह है की राधा जी ने अपनी स्वंय की इच्छा से वहां पर प्रकट हुई थी। राधा जी कलिंदजा कूलवर्ती निकुंज प्रदेश के एक सुन्दर मंदिर में अवतरित हुई थीं। उस समय शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि और सोमवार का दिन, अनुराधा नक्षत्र और मध्यान्ह काल के 12 बज रहे थे। जिस समय राधा जी का जन्म हुआ था।
कृष्ण जन्माष्टमी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त
- तिथि: 15 अगस्त 2025 (शुक्रवार)
- निशीथ पूजा का समय: रात 12:03 से 12:49 (16 अगस्त)
- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 15 अगस्त रात 9:44 बजे
- अष्टमी तिथि समाप्त: 16 अगस्त रात 11:19 बजे (स्थान के अनुसार समय में अंतर हो सकता
जन्माष्टमी पूजा विधि
जन्माष्टमी के दिन भक्त सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन निर्जला या फलाहार उपवास रखते हैं। घर या मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या बाल गोपाल को स्नान कराकर नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। फूल, तुलसी दल, धूप, दीप और माखन-मिश्री का भोग अर्पित किया जाता है। रात 12 बजे निशीथ काल में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाते हुए जन्म आरती, भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चारण के साथ पूजा पूरी की जाती है।
मथुरा वृंदावन जन्माष्टमी
मथुरा और वृंदावन में जन्माष्टमी का उत्सव अद्भुत भव्यता और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। मथुरा, जो श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है, वहां मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है और पूरे दिन रासलीला, झांकियां और भजन-कीर्तन होते हैं। वृंदावन में श्रीकृष्ण-राधा की लीलाओं का मंचन, झूला उत्सव और मंदिरों में विशेष सजावट भक्तों को दिव्य आनंद का अनुभव कराती है। यहां की जन्माष्टमी की रौनक देखने दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।
उत्सव और परंपराएं
- व्रत और पूजा: भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्म का उत्सव मनाकर व्रत खोलते हैं।
- मध्यरात्रि जन्मोत्सव: मंदिरों में भजनों की गूंज, शंख-घंटियों की ध्वनि और फूलों की सजावट के बीच जन्म आरती होती है।
- झूला सजाना: छोटे-छोटे झूलों पर बाल गोपाल की मूर्ति को झुलाया जाता है।
- दही हांडी: महाराष्ट्र और गुजरात में युवाओं की टीमें मानव पिरामिड बनाकर मटकी फोड़ने की प्रतियोगिता करती हैं।
- रासलीला: मथुरा-वृंदावन में श्रीकृष्ण और राधा की लीलाओं का मंचन होता है।
भारत में कहां होते हैं सबसे बड़े उत्सव
- मथुरा और वृंदावन (उत्तर प्रदेश): भव्य रासलीला, झांकियां और शोभायात्राएं।
- द्वारका (गुजरात): जगमगाती सजावट और विशेष मंदिर पूजा।
- मुंबई और पुणे (महाराष्ट्र): रोमांचक दही हांडी प्रतियोगिताएं।
- पुरी (ओडिशा) और नदिया (पश्चिम बंगाल): ‘नंद उत्सव’ के रूप में उल्लासपूर्ण भजन-कीर्तन।
आध्यात्मिक संदेश
श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव हमें यह याद दिलाता है कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं। यह दिन प्रेम, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
जन्माष्टमी 2025 केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच अटूट प्रेम का प्रतीक है। चाहे मंदिरों में भक्ति गीत हों, घरों में पूजा-पाठ, या गलियों में दही हांडी का जोश — कृष्ण जन्मोत्सव हर किसी के जीवन में उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा भर देता है।
FAQs – जन्माष्टमी 2025 से जुड़े सवाल
Q1: जन्माष्टमी 2025 किस दिन है?
A: 15 अगस्त 2025, शुक्रवार को।
Q2: कृष्ण जन्म का समय कब है?
A: निशीथ पूजा का समय रात 12:03 से 12:49 है।
Q3: दही हांडी 2025 कब है?
A: दही हांडी 16 अगस्त 2025 को कई जगहों पर मनाई जाएगी।
Q4: जन्माष्टमी पर व्रत कैसे करें?
A: दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखकर, रात में कृष्ण जन्म के बाद व्रत तोड़ें।